UNESCO रिपोर्ट: ग्रामीण भारत में उच्च माध्यमिक शिक्षा की स्थिति और चुनौतियां

09 Oct 2026
UNESCO रिपोर्ट: ग्रामीण भारत में उच्च माध्यमिक शिक्षा की स्थिति और चुनौतियां

"जब तक हर ग्रामीण बेटी को शिक्षा का समान अवसर नहीं मिलता, तब तक सच्ची सामाजिक और शैक्षणिक प्रगति अधूरी है।"

 

संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) द्वारा जारी हालिया रिपोर्ट 'Gender Equity in Access to Education' में 31 निम्न और मध्यम आय वाले देशों में शिक्षा क्षेत्र में लड़के-लड़कियों के बीच मौजूद अंतर का गहराई से अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में उच्च माध्यमिक (11वीं और 12वीं) शिक्षा पूरी करने का कुल समायोजित जेंडर पैरिटी इंडेक्स (GPI) 0.89 है।

इसका सरल शब्दों में अर्थ यह है कि जहां 100 लड़के उच्च माध्यमिक स्तर की पढ़ाई पूरी करते हैं, वहीं लगभग 89 लड़कियां ही इस स्तर तक पहुंच पाती हैं। हालांकि, यह राष्ट्रीय औसत आंकड़ा अपने आप में ग्रामीण और शहरी इलाकों के बीच के बड़े विरोधाभास और असमानता को छिपा लेता है।

ग्रामीण बनाम शहरी भारत: शिक्षा का भारी अंतर

रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि भारत के शहरी क्षेत्रों में लड़के और लड़कियां उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के मामले में लगभग बराबरी (1.0) पर पहुंच चुके हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है:

ग्रामीण स्तर पर गिरावट: ग्रामीण भारत में 100 लड़कों के मुकाबले केवल 59 लड़कियां ही 11वीं और 12वीं की पढ़ाई पूरी कर पाती हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों का इंडेक्स घटकर बहुत नीचे आ जाता है।

दाखिले के आंकड़े (ASER 2024): ASER 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, 15-16 वर्ष की आयु वर्ग की लगभग 8.1 प्रतिशत ग्रामीण लड़कियां स्कूल में दाखिला ही नहीं ले पाती हैं (यह आंकड़ा 2022 में 7.9 प्रतिशत था)। इससे स्पष्ट होता है किशोरावस्था में लड़कियों को शिक्षा से जोड़े रखना आज भी एक बड़ी चुनौती है।

आर्थिक स्थिति का प्रभाव: रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि गरीबी शिक्षा में इस अंतर को और अधिक बढ़ा देती है। सबसे गरीब परिवारों में जेंडर पैरिटी इंडेक्स का औसत बहुत कम होता है, जबकि अमीर परिवारों में यह बेहतर (0.92) पाया गया है।

शिक्षा में बाधा बनने वाले मुख्य कारण

UNESCO की रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि शिक्षा तक पहुंच में यह अंतर केवल व्यक्तिगत प्राथमिकताओं की वजह से नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई व्यवस्थागत और व्यावहारिक कारण जिम्मेदार हैं:

व्यावहारिक रुकावटें: स्कूल आने-जाने का अधिक खर्च, परिवहन की असुविधा और स्कूल में पर्याप्त सुरक्षा का अभाव।

बुनियादी सुविधाएं: स्कूलों में लड़कियों के लिए पर्याप्त और अलग शौचालय सुविधाओं की कमी।

सामाजिक और सांस्कृतिक कारक: कम उम्र में शादी (बाल विवाह) और सामाजिक पूर्वाग्रह, जिसके कारण लड़कियों को बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ती है।

मातृत्व और देखरेख की कमी: कम उम्र की मांओं के लिए बच्चों की देखभाल की सुविधा न होना, जिससे वे दोबारा स्कूल में दाखिला नहीं ले पाती हैं।

सकारात्मक पहल और समाधान की दिशा

रिपोर्ट में भारत और अन्य देशों में चलाई गई कुछ सफल योजनाओं का हवाला दिया गया है, जिनके सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं:

शौचालय निर्माण: देश भर में स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय बनाने की पहल से किशोरियों के स्कूल में दाखिले और उपस्थिति में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

मिड-डे मील योजना: स्कूल में कम उम्र से और लगातार मिलने वाले पोष्टिक मिड-डे मील से स्कूल छोड़ने की दर (Dropout Rate) में कमी आई है, विशेषकर लड़कियों में।

सामुदायिक प्रयास: स्थानीय स्तर पर चलाए जाने वाले कार्यक्रमों और छात्रवृत्ति योजनाओं से लड़कियों को जीवन की जरूरी बातें सीखने और माध्यमिक शिक्षा पूरी करने में सहायता मिली है।

अंतरराष्ट्रीय उदाहरण: रिपोर्ट में नेपाल का उदाहरण भी दिया गया है, जहां मुफ्त और अनिवार्य बुनियादी शिक्षा के कानून, लक्षित छात्रवृत्ति और बेहतर स्कूल सुविधाओं के दम पर 1990 के 8% से बढ़कर 2024 तक लड़कियों के माध्यमिक शिक्षा पूरी करने का आंकड़ा 89% पर पहुंच गया है और जेंडर समानता हासिल हो गई है।

निष्कर्ष

UNESCO की यह रिपोर्ट स्पष्ट चेतावनी देती है कि यदि केवल एक योजना या आंशिक कदम उठाया जाए, तो वह पर्याप्त नहीं होगा। फीस माफ करने से शिक्षा तब तक मुफ्त नहीं होती जब तक आने-जाने का खर्च ज्यादा हो, और छात्रवृत्ति का लाभ तब तक नहीं मिलता जब तक स्कूल सुरक्षित न हों। इसलिए, ग्रामीण भारत में बेटियों की शिक्षा को पंख देने के लिए सामाजिक सोच बदलने के साथ-साथ व्यावहारिक और बुनियादी रुकावटों को जड़ से समाप्त करना होगा।

 

 

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