गांव से शहर की ओर बढ़ता कदम: संतुलन, समावेशी विकास और समाधान की तलाश

09 Sep 2026
गांव से शहर की ओर बढ़ता कदम: संतुलन, समावेशी विकास और समाधान की तलाश

ग्रामीण सीमाओं को सशक्त बनाकर ही संवर सकती हैं शहरों की सांसें—जानिए विशेषज्ञों की राय।

 

 

भारत में गांवों से शहरों की ओर होता निरंतर पलायन आज एक अत्यंत गंभीर और जटिल सामाजिक-आर्थिक चुनौती का रूप ले चुका है। बुनियादी सुविधाओं और आजीविका की तलाश में जब ग्रामीण आबादी शहरों का रुख करती है, तो इससे शहरी ढांचे पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। इसके प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में अनियोजित निर्माण, बेतरतीब बसावट और झुग्गी-झोपड़ियों (स्लम) का विस्तार देखने को मिलता है। इस महत्वपूर्ण विषय पर गहराई से मंथन करने के लिए 'सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च' (CPR) द्वारा 'एकीकृत ग्रामीण व शहरी विकास' विषय पर एक राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया, जिसमें देश के जाने-माने विचारकों, पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों और शोधकर्ताओं ने अपने विचार साझा किए।

पलायन की मूल वजह: रोजगार और मूलभूत ढांचों का अभाव

वेबिनार में विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और स्थायी रोजगार के अवसरों की कमी ही इस पलायन का मुख्य कारण है। प्रस्तुत किए गए शोधपत्रों से यह तथ्य भी सामने आया कि रोजगार की कमी केवल गांवों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरों में भी यह एक बड़ी समस्या है। इसलिए, देश को एक ऐसे समावेशी विकास मॉडल की आवश्यकता है जो व्यापक स्तर पर नए रोजगार के अवसरों का सृजन कर सके।

कृषि को लाभदायक बनाना और किसानों की आय में वृद्धि

पलायन को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है। देश का सबसे बड़ा कार्यबल आज भी कृषि क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। वेबिनार के विशेषज्ञों का मानना था कि:

उच्च मूल्य वाली खेती: पारंपरिक फसलों के साथ-साथ उच्च मूल्य वाले कृषि उत्पादों (High-value Agriculture) को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

प्रसंस्करण और विपणन: खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) और सुदृढ़ विपणन नेटवर्क के माध्यम से किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है।

क्रय शक्ति में सुधार: यह रणनीति किसानों की आय को दोगुना से अधिक कर सकती है, जिससे ग्रामीण कार्यबल की क्रय शक्ति बढ़ेगी और समग्र अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

प्रशासनिक सुधार और वित्तीय प्रबंधन

ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों के सर्वांगीण विकास के लिए योजनाओं के क्रियान्वयन और प्रबंधन में संरचनात्मक बदलाव की आवश्यकता रेखांकित की गई।

बजट का सही उपयोग: गांवों के विकास के लिए आवंटित बजट का पारदर्शी और प्रभावी ढंग से उपयोग सुनिश्चित करने के लिए वित्तीय प्रबंधन को मजबूत करना होगा।

स्थानीय निकायों की भागीदारी: ग्राम सभाओं और शहरी निकायों की वास्तविक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ही विकास की योजनाएं तैयार की जानी चाहिए।

पर्यावरण और शहरी मास्टर प्लान: नदियों को स्वच्छ रखने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए शहरों के विकास को मास्टर प्लान के अनुसार ही दिशा दी जानी चाहिए।

सफल मॉडल: तेलंगाना का प्रयोग

असंतुलन को दूर करने के लिए 'इंस्टीट्यूशनल सिस्टम्स प्लानिंग काउंसिल' (ISPC) द्वारा डिजाइन किए गए एक विशेष मॉडल पर भी चर्चा हुई। इस मॉडल को वर्तमान में तेलंगाना के दो क्षेत्रों में लागू किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य गांवों के समीप ही रोजगार के अवसर पैदा करना है, ताकि ग्रामीणों को अपनी आजीविका के लिए दूर न जाना पड़े।

विशेषज्ञों की सहभागिता

इस वेबिनार में नीतिगत बदलावों और व्यावहारिक समाधानों पर गहन विचार-विमर्श किया गया। कार्यक्रम में सीपीआर के कौशल किशोर, डॉ. ओंकार मित्तल, प्रोफेसर शशि शेखर सिंह, आईएएस अधिकारी शशि शेखर सिंह, पूर्व आईएएस अधिकारी जी. अशोक कुमार, डॉ. अलका राय, डॉ. श्रीनिवास और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर संतोष मेहरोत्रा सहित कई गणमान्य विशेषज्ञों ने अपनी महत्वपूर्ण सहभागिता निभाई।

गांवों को केवल खाद्यान्न उत्पादन का केंद्र न मानकर उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से समृद्ध बनाना होगा। जब तक गांव आत्मनिर्भर नहीं होंगे, तब तक शहरों को भी अनियोजित भीड़ और अव्यवस्था से मुक्ति नहीं मिल सकती।


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