मौत का सौदागर बनता नकली दवाओं का सिंडिकेट: रेबीज वैक्सीन 'अभयरेब' के फर्ज़ीवाड़े से दहला देश

08 Sep 2026
मौत का सौदागर बनता नकली दवाओं का सिंडिकेट: रेबीज वैक्सीन 'अभयरेब' के फर्ज़ीवाड़े से दहला देश

जीवनरक्षक टीकों की आड़ में नकली दवा माफिया का खूनी खेल — सवाल सिर्फ घटिया निर्माण का नहीं, सीधे-सीधे जनस्वास्थ्य और मानवीय संवेदनाओं की हत्या का है!

 

 

भूमिका: सुरक्षा के नाम पर जानलेवा धोखा

भारत में नकली दवाओं के बढ़तेजाल और अवैध निर्माण के काले कारोबार की ज़द में इस बार देश की सबसे भरोसेमंद और सर्वाधिक इस्तेमाल की जाने वाली रेबीज रोधी वैक्सीन 'अभयरेब' (Abhayrab) आ गई है। रेबीज जैसे 100% जानलेवा संक्रमण से सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाई गई वैक्सीन का घटिया और नकली पाया जाना न केवल हमारी वर्तमान स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा की नींव को भी झकझोर कर रख देता है। जीवन की उम्मीद जगाने वाले टीके का ही नकली निकलना सीधे तौर पर असहाय मरीजों के साथ घिनौना छल है।

विवाद के केंद्र में 'अभयरेब' (Abhayrab)

भारत के घरेलू रेबीज वैक्सीन बाजार में अकेले 40 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली 'अभयरेब' (Abhayrab) का निर्माण इंडियन इम्यूनोलॉजिकल लिमिटेड (IIL) द्वारा अपने प्रतिष्ठित 'ह्यूमन बायोलॉजिकल्स इंस्टीट्यूट' के माध्यम से किया जाता है। इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाली वैक्सीन के नाम पर नकली दवा माफिया द्वारा समानांतर अवैध नेटवर्क चलाना बेहद चिंताजनक है।

देश की राजधानी में ऐसे उजागर हुआ फर्जीवाड़ा

इस सनसनीखेज मामले का पर्दाफाश तब हुआ जब 22 अप्रैल 2026 को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच और दिल्ली ड्रग्स कंट्रोल डिपार्टमेंट की संयुक्त टीम ने मुखर्जी नगर स्थित एक बिना लाइसेंस वाली रिहायशी जगह पर गुप्त छापेमारी की।

नकली शीशियों की ज़ब्ती: कार्रवाई के दौरान मौके से 'अभयरेब' के लेबल और बैच नंबर KE25012 दर्ज की गई सैकड़ों संदिग्ध शीशियां ज़ब्त की गईं। इस अवैध गतिविधियों में शामिल चार लोगों को रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया।

प्रयोगशाला की जांच में फेल: कसौली स्थित प्रतिष्ठित 'सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरी' (CDL) में जब ज़ब्त नमूनों का परीक्षण किया गया, तो वे पोटेंसी (क्षमता) टेस्ट में पूरी तरह विफल साबित हुए। सीडीएल ने इन्हें "मानक गुणवत्ता के विपरीत" और गलत लेबल (Misbranded) वाला घोषित कर दिया।

असली-नकली का अंतर: गहराई से जांच करने पर ज़ब्त शीशियों की पैकेजिंग, आर्टवर्क, QR-कोड वेरिफिकेशन, ढक्कन के रंग और लाइसेंस विवरणों में असली वैक्सीन की तुलना में भारी खामियां और असंगतियां पाई गईं।

निर्माता कंपनी (IIL) का स्पष्टीकरण: असली बैच पूरी तरह सुरक्षित

नकली वैक्सीन के पकड़े जाने के बाद निर्माता कंपनी IIL ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि ज़ब्त शीशियां उनके संयंत्र में निर्मित नहीं हुई थीं।

कंपनी के अधिकृत आंकड़ों के अनुसार, असली KE25012 बैच में कुल 83,370 शीशियां तैयार की गई थीं, जिन्हें सभी अनिवार्य गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों पर खरा उतरने के बाद 7 नवंबर 2025 को केवल अधिकृत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क के माध्यम से बाजार में जारी किया गया था। सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) ने भी इस बात की पुष्टि की है कि असली बैच का कोई भी हिस्सा भारत से बाहर निर्यात नहीं हुआ था।

इन तथ्यों से स्पष्ट होता है कि असली निर्माण प्रक्रिया में कोई त्रुटि नहीं थी, बल्कि असामाजिक तत्वों ने असली बैच नंबर का दुरुपयोग करके बाजार में नकली वैक्सीन का जानलेवा जाल बिछाया था।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गूंज: ऑस्ट्रेलिया में भी मचा हड़कंप

भारत में निर्मित रेबीज वैक्सीन के फर्ज़ीवाड़े का यह कोई अकेला मामला नहीं है। इसका दायरा अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक फैल चुका है:

दिसंबर 2025 (ऑस्ट्रेलिया अलर्ट): ऑस्ट्रेलिया के 'टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप ऑन इम्यूनाइजेशन' (ATAGI) ने भारत में अभयरेब के एक अन्य फर्जी बैच (KA24014) की मौजूदगी की रिपोर्ट मिलने पर वैश्विक अलर्ट जारी किया था।

यात्रियों के लिए सलाह: ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों ने उन सभी यात्रियों को, जिन्होंने नवंबर 2023 के बाद भारत प्रवास के दौरान यह टीका लगवाया था, एहतियातन ऑस्ट्रेलिया में रिप्लेसमेंट (अतिरिक्त) डोज लेने का परामर्श दिया था।

दिल्ली ड्रग्स कंट्रोल की एडवाइजरी: देश के प्रमुख महानगरों में नकली टीकों की खेप मिलने के बाद मार्च 2025 में ही दिल्ली ड्रग्स कंट्रोल डिपार्टमेंट ने स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए विशेष चेतावनी और एडवाइजरी जारी की थी।

नकली रेबीज वैक्सीन: एक अदृश्य और निश्चित मौत का पैगाम

रेबीज एक ऐसा भयानक संक्रमण है जिसके लक्षण (Hydrophobia आदि) एक बार उभर आएं, तो मरीज की मौत लगभग 100% तय मानी जाती है।

भारत में भयावह स्थिति: भारत में हर साल आवारा और पालतू जानवरों के काटने के करीब 90 से 91 लाख मामले दर्ज होते हैं, जिनमें से औसतन 5,726 लोगों की दर्दनाक मौत रेबीज के कारण हो जाती है।

झूठी सुरक्षा का घातक अहसास: यदि किसी पीड़ित को पशु के काटने के बाद असली वैक्सीन के बजाय पानी या घटिया रसायन भरी नकली वैक्सीन लगा दी जाए, तो मरीज और उसका परिवार इस झूठी फिक्र में रहते हैं कि इलाज हो चुका है। जबकि हकीकत में, शरीर में एंटीबॉडी न बनने के कारण वायरस तंत्रिका तंत्र पर हमला कर देता है और मरीज की असामयिक मौत हो जाती है।

क्या वैक्सीन लगने के बावजूद हुई मौतें नकली टीके से जुड़ी हैं?

टीका लगवाने के बाद भी मरीजों की मौत के मामलों की जब नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस (NIMHANS) के शोधकर्ताओं ने 89 मामलों में विस्तृत जांच की, तो एक महत्वपूर्ण सच सामने आया।

शोध में पाया गया कि 89 में से केवल 3 मामलों में ही इलाज (वैक्सीन की विफलता) फेल हुआ था। अधिकांश मौतों का मुख्य कारण डॉक्टरी और उपचार प्रोटोकॉल में बरती गई भारी लापरवाही थी—जैसे घाव को बहते पानी और साबुन से तुरंत न धोना, पहला टीका लगाने में देरी करना या फिर गहरे घावों के मामलों में 'रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन' (RIG) न देना।

इसका सीधा अर्थ यह है कि मरीज की जान बचाने के लिए असली और गुणवत्तापूर्ण वैक्सीन के साथ-साथ पूरे 'पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस' (PEP) प्रोटोकॉल का अक्षरशः पालन होना अनिवार्य है।

देश में पैर पसारता संगठित 'नकली दवा माफिया'

'अभयराब' कांड ने भारत में तेजी से अपने पांव पसार रहे संगठित फर्जी दवा सिंडिकेट की भयावह तस्वीर को बेनकाब कर दिया है:

लाइफ-सेविंग दवाएं निशाने पर: 'इंडियन फार्मास्युटिकल एलायंस' के अनुसार, जालसाज अब साधारण बुखार-सर्दी की गोलियों तक सीमित नहीं हैं; वे कैंसर-रोधी दवाओं, एंटीबायोटिक्स और रेबीज जैसे जीवनरक्षक टीकों की हूबहू नकल तैयार कर रहे हैं।

हाई-टेक अपराध: ये सिंडिकेट इतने शातिर हैं कि असली सप्लायर्स के स्रोतों से पैकेजिंग मटीरियल, प्रिंटिंग इंक, QR कोड की नकल और होलोग्राफिक सील तक हासिल कर लेते हैं, जिससे आम आदमी तो क्या, विशेषज्ञ भी धोखा खा जाएं।

भारी मुनाफे का लालच: रिटेलर्स और छोटे डिस्ट्रीब्यूटर्स को 60 से 80 प्रतिशत तक भारी डिस्काउंट का लालच देकर यह नकली माल बाजार की मुख्यधारा में खपाया जाता है।

जनता का डगमगाता विश्वास: ASPA-क्रिसिल इंटेलिजेंस की 'स्टेट ऑफ काउंटरफिटिंग इन इंडिया 2025' रिपोर्ट के अनुसार, आम उपभोक्ताओं का मानना है कि भारतीय बाजार में उपलब्ध लगभग 28% दवाएं नकली या संदेहास्पद हो सकती हैं।

निष्कर्ष और भावी राह: कठोर कदम उठाने का समय

नकली रेबीज वैक्सीन का यह मामला महज कोई वित्तीय हेरफेर या आर्थिक अपराध नहीं है, बल्कि यह सीधे-सीधे सामूहिक मानव हत्या के प्रयास के समतुल्य है।

यद्यपि 'ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया' (DCGI) ने सभी राज्य दवा नियंत्रकों को संदिग्ध बैच KE25012 की बिक्री पर कड़ी निगरानी रखने और जब्ती के निर्देश जारी किए हैं, लेकिन यह नाकाफी है। जब तक फर्जी दवा बनाने और बेचने वालों के खिलाफ फास्ट-ट्रैक अदालतों के माध्यम से कड़े दंड का प्रावधान नहीं किया जाता और पूरी सप्लाई चेन में पारदर्शी 'टैक-एंड-ट्रेस' (Track-and-Trace) डिजिटल सिस्टम सख्ती से लागू नहीं होता, तब तक मासूम जिंदगियां यूं ही खतरे में पड़ती रहेंगी। स्वास्थ्य सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाले इन सौदागरों पर कड़ा प्रहार आज समय की सबसे बड़ी मांग है।


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