जलवायु संकट की आहट: 1.5°C की सीमा पार करने की ओर बढ़ती पृथ्वी, WMO ने जारी की चेतावनी

06 Sep 2026
जलवायु संकट की आहट: 1.5°C की सीमा पार करने की ओर बढ़ती पृथ्वी, WMO ने जारी की चेतावनी

बढ़ता तापमान, पिघलते ग्लेशियर और अनिश्चित मॉनसून—2025-2029 के बीच गंभीर जलवायु परिवर्तनों का सामना कर सकती है दुनिया।

 

 

विश्व मौसम संगठन (WMO) की हालिया रिपोर्ट ने वैश्विक समुदाय के समक्ष एक गंभीर चेतावनी प्रस्तुत की है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 से 2029 के बीच पृथ्वी का औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक काल (1850-1900) के मुकाबले 1.5°C से अधिक होने की 70% संभावना है। इसके अतिरिक्त, अगले पांच वर्षों में से कम से कम एक वर्ष के अब तक के सबसे गर्म वर्ष (2024) का रिकॉर्ड तोड़ने की 80% संभावना जताई गई है। धरती के तापमान में यह निरंतर वृद्धि समुद्र स्तर को बढ़ाकर तटीय क्षेत्रों और द्वीपीय देशों के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा रही है।

पेरिस समझौते का लक्ष्य और 2024 का ऐतिहासिक रिकॉर्ड वर्ष 2024 पहला ऐसा वर्ष दर्ज किया गया, जब वैश्विक औसत तापमान आधार स्तर से 1.5°C अधिक रहा। हालांकि पेरिस जलवायु समझौते (2015) का लक्ष्य लंबे समय (20-30 वर्ष) के औसत तापमान को 1.5°C तक सीमित रखना है, लेकिन अल्पकालिक स्तर पर इस सीमा का टूटना बेहद चिंताजनक है। इस वर्ष सभी राष्ट्रों को 2031-2035 के लिए अपनी नई राष्ट्रीय जलवायु योजनाएं (NDCs) संयुक्त राष्ट्र को सौंपनी हैं, जिनमें कठोर उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य निर्धारित करना अनिवार्य हो गया है।

WMO रिपोर्ट के मुख्य बिंदु:

वार्षिक तापीय वृद्धि: 2025-2029 के दौरान प्रतिवर्ष औसत तापमान 1.2°C से 1.9°C अधिक रहने का अनुमान है।

अस्थायी उछाल: कम से कम एक वर्ष में तापमान के 1.5°C की सीमा को पार करने की 86% संभावना है।

ध्रुवीय प्रभाव: आर्कटिक क्षेत्र में तापमान वैश्विक औसत से 3.5 गुना अधिक तेजी से बढ़ेगा, जिससे बारेंट्स और बेरिंग सागर में समुद्री बर्फ में भारी कमी आएगी।

मौसम चक्र में बदलाव: अमेजन क्षेत्र में सूखा बढ़ने की आशंका है, जबकि साहेल, उत्तरी यूरोप और साइबेरिया में सामान्य से अधिक वर्षा हो सकती है।

दक्षिण एशिया और भारत पर प्रभाव WMO और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, दक्षिण एशिया में मॉनसून के दौरान सामान्य से अधिक और अनियमित वर्षा का रुझान बना रहेगा। यद्यपि यह कृषि के लिए जल उपलब्धता सुनिश्चित करता है, परंतु अतिवृष्टि, बाढ़ और बेमौसम बारिश से फसलों तथा अवसंरचना को भारी नुकसान का जोखिम भी बढ़ता है।

समाधान और भावी रणनीति WMO की उप-महासचिव को बैरेट ने स्पष्ट किया है कि यह स्थिति अर्थव्यवस्था, पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डालेगी। इससे निपटने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने आवश्यक हैं:

नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा: कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाकर सौर व पवन ऊर्जा को अपनाना।

हरित तकनीक एवं वनीकरण: इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रसार, ऊर्जा-कुशल उपकरण और व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण।

अनुकूलन नीतियां: जल प्रबंधन, जलवायु-सहनशील कृषि और वैज्ञानिक पूर्वानुमान प्रणालियों का सुदृढ़ीकरण।

यह रिपोर्ट वैश्विक नेतृत्व के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम अपरिवर्तनीय हो जाएंगे।


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