पृथ्वी के गर्भ से ऊर्जा का नया सवेरा: भारत में भूतापीय क्रांति

04 Sep 2026
पृथ्वी के गर्भ से ऊर्जा का नया सवेरा: भारत में भूतापीय क्रांति

धरती की अंतर्निहित ऊष्मा से 24x7 बिजली: नेट-जीरो 2070 की ओर भारत का एक अभूतपूर्व और अटूट कदम।

 

पृथ्वी के भीतर समाया अपार ताप स्वच्छ और हरित ऊर्जा का एक असीम स्रोत है, जिसे भूतापीय ऊर्जा (Geothermal Energy) कहा जाता है। भारत में उपलब्ध समृद्ध भू-तापीय संसाधनों को देखते हुए यह ऊर्जा भविष्य में चौबीसों घंटे बिजली उपलब्ध कराने वाले एक अत्यंत विश्वसनीय स्रोत के रूप में उभर सकती है। इसी असीम क्षमता को साकार करने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय भूतापीय ऊर्जा नीति तैयार की गई है, जिसका लक्ष्य इसे देश के नवीकरणीय ऊर्जा परिदृश्य का प्रमुख स्तंभ बनाना है।

यह दूरदर्शी पहल वर्ष 2070 तक 'नेट-जीरो' उत्सर्जन हासिल करने के भारत के राष्ट्रीय लक्ष्य को नई गति दे रही है। लद्दाख की पूगा घाटी में हाल ही में देश के पहले दो भूतापीय कुओं (Geothermal Wells) का सफल संचालन इस दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है, जो भारत की भूतापीय ऊर्जा यात्रा की औपचारिक शुरुआत का प्रतीक है।

1. चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने वाला विश्वसनीय ऊर्जा स्रोत

सौर और पवन ऊर्जा जैसे पारंपरिक नवीकरणीय स्रोतों के विपरीत, भूतापीय ऊर्जा मौसम या दिन-रात के चक्र पर निर्भर नहीं होती। यह निरंतर (Baseload) और कम कार्बन उत्सर्जन वाला ऊर्जा स्रोत है।

नीतिगत ढांचा: सितंबर 2025 में अधिसूचित 'राष्ट्रीय भूतापीय ऊर्जा नीति' देश में भू-तापीय संसाधनों के अन्वेषण, विकास और व्यावसायिक उपयोग के लिए एक स्पष्ट रोडमैप प्रदान करती है।

नोडल मंत्रालय: नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) इस नीति और इससे जुड़ी परियोजनाओं के सुचारू कार्यान्वयन के लिए नोडल एजेंसी के रूप में कार्य कर रहा है।

2. पूगा घाटी, लद्दाख: भारत का पहला बड़ा और ऐतिहासिक कदम

जुलाई 2026 में ओएनजीसी ऊर्जा केंद्र (ONGC Energy Centre) ने लद्दाख की पूगा घाटी में देश के पहले दो भू-तापीय कुओं को चालू करके एक नया अध्याय लिखा।

भौगोलिक महत्व: समुद्र तल से 14,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित पूगा घाटी अपने प्राकृतिक गर्म जलस्रोतों (Hot Springs) और विशाल तापीय भंडार के लिए प्रसिद्ध है।

1,000 मीटर गहरे कुएं: ये कुएं भूमिगत तापीय जलाशय के सही आकलन और उसकी क्षमता को समझने में मदद कर रहे हैं।

1 मेगावाट प्रदर्शन परियोजना: इन कुओं से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर भारत की पहली 1 MW प्रदर्शन-आधारित भूतापीय बिजली परियोजना की नींव रखी जा रही है।

3. विज्ञान और तंत्र: पृथ्वी की गहराइयों से बिजली तक

(A) क्रस्ट से कोर तक पृथ्वी की संरचना

पृथ्वी के आंतरिक भाग का अत्यधिक तापमान मुख्य रूप से यूरेनियम, थोरियम और पोटेशियम जैसे रेडियोधर्मी तत्वों के क्षय (Radioactive Decay) तथा पृथ्वी के निर्माण के समय की अवशिष्ट ऊष्मा (Residual Heat) से उत्पन्न होता है।

परत (Layer)मोटाई / चौड़ाईविशेषताएँ एवं तापमान
आंतरिक कोर (Inner Core)~2,400 किमी (व्यास)लोहे और निकल की अत्यधिक ठोस गेंद; तापमान 5,000°C–6,000°C
बाहरी कोर (Outer Core)~2,400 किमी मोटीपिघले हुए लोहे और निकल की तरल परत
मैंटल (Mantle)~2,900 किमी मोटीगर्म व घनी चट्टानों की सबसे बड़ी परत; सीमा पर तापमान ~3,700°C
भूपर्पटी (Crust)5-8 किमी (समुद्र) / 24-56 किमी (महाद्वीप)सबसे बाहरी ठोस परत, जहाँ दरारों के माध्यम से गर्मी ऊपर आती है

(B) विद्युत उत्पादन की कार्यप्रणाली

1.गहरे कुओं की ड्रिलिंग:प्राकृतिक जलाशय.

भूमिगत दरारों में मौजूद अत्यधिक गर्म पानी और भाप के जलाशयों तक पहुँचने के लिए गहरे कुएं खोदे जाते हैं।

2.टरबाइन और जनरेटर संचालन:यांत्रिक ऊर्जा.

उच्च दाब वाली भाप को सतह पर लाकर टरबाइन घुमाई जाती है, जिससे जनरेटर से बिजली पैदा होती है।

3.पुनः इंजेक्शन (Re-injection):टिकाऊ प्रबंधन.

इस्तेमाल किए गए पानी को ठंडा करके वापस भूमिगत जलाशय में पंप कर दिया जाता है, जिससे जलाशय का दबाव और ऊर्जा चक्र निरंतर बना रहता है।

4. भारत में 381 गर्म झरने और 10 प्रमुख भू-तापीय प्रांत

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की मैपिंग के अनुसार भारत की कुल सैद्धांतिक भूतापीय क्षमता 10.6 गीगावॉट (10,600 MW) आंकी गई है। देश में 381 गर्म झरनों की पहचान की गई है और इन्हें 10 प्रमुख प्रांतों में वर्गीकृत किया गया है:

हिमालयी भू-तापीय प्रांत (लद्दाख, हिमाचल, उत्तराखंड)

सोन-नर्मदा-तापी (SONATA) क्षेत्र

पश्चिमी तट (Western Coast)

कैम्बे ग्रैबेन (Cambay Graben, गुजरात)

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह

नागा-लुसाई क्षेत्र

अरावली प्रांत

महानदी बेसिन

गोदावरी बेसिन

दक्षिण भारतीय क्रेटोनिक क्षेत्र

इसके अतिरिक्त, वर्धित भू-तापीय प्रणाली (EGS) और उन्नत भू-तापीय प्रणाली (AGS) जैसी आधुनिक तकनीकें कम पारगम्य क्षेत्रों में भी ऊर्जा निष्कर्षण को संभव बना रही हैं।

5. गुजरात से अरुणाचल और तेलंगाना: देशभर में जारी प्रयोग

भारत केवल शोध तक सीमित न रहकर क्षेत्रीय प्रदर्शन परियोजनाओं को तेज़ी से लागू कर रहा है:

परित्यक्त तेल कुओं का पुनरुयोग (अंकलेश्वर, गुजरात): बंद पड़े या अनुत्पादक तेल व गैस कुओं को रेट्रोफिट करके भू-तापीय ऊर्जा निकालने का प्रयोग जारी है, जिससे नई ड्रिलिंग की लागत बचती है।

सौर-भूतापीय हाइब्रिड मॉडल (गांधीनगर): 3 भू-तापीय कुओं से 70-80°C का द्रव प्राप्त कर 50-90 kW बिजली उत्पादन का सफल प्रदर्शन।

भू-तापीय शीतलन (हैदराबाद): इमारतों में एयर कंडीशनिंग और हीटिंग के लिए उथली भू-तापीय प्रणालियों (Borehole Heat Exchangers) का विकास।

संसाधन आकलन (तवांग, अरुणाचल प्रदेश): 5 प्रमुख स्थलों पर भू-रासायनिक विश्लेषण और क्षेत्रीय जांच का काम अंतिम चरण में।

6. वैश्विक परिदृश्य और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग

2025 के अंत तक वैश्विक स्तर पर भूतापीय क्षमता 15.67 गीगावॉट तक पहुँच चुकी है, जिसमें अमेरिका, इंडोनेशिया, फिलीपींस, तुर्किए और न्यूजीलैंड जैसे देशों का दबदबा (लगभग 67% हिस्सा) है।

भारत अपनी घरेलू तकनीकी क्षमता विकसित करने के लिए ऑस्ट्रेलिया, आइसलैंड और सऊदी अरब के साथ द्विपक्षीय समझौतों के ज़रिए अनुसंधान, जलाशय प्रबंधन और उन्नत तकनीकों का आदान-प्रदान कर रहा है। अक्षय ऊर्जा अनुसंधान और प्रौद्योगिकी विकास कार्यक्रम (RE-RTD) के तहत स्वदेशी तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

7. आगे की राह: व्यावसायिक उत्पादन की ओर बढ़ते कदम

यद्यपि व्यावसायिक स्तर पर बड़े पैमाने पर भूतापीय बिजली उत्पादन अभी शुरू होना बाकी है, लेकिन राष्ट्रीय नीति, सार्वजनिक व निजी क्षेत्र की भागीदारी, डेटा रिपॉजिटरी और पूगा घाटी जैसी सफल पायलट परियोजनाओं ने इसके लिए एक मजबूत इकोसिस्टम तैयार कर दिया है।

यह तकनीक न केवल बिजली उत्पादन बल्कि हीटिंग, शीतलन, कृषि (ग्रीनहाउस) और जलीय कृषि (Aquaculture) में सीधे ताप उपयोग (Direct Heating) के लिए भी क्रांतिकारी साबित हो सकती है।

निष्कर्ष

भू-तापीय ऊर्जा भारत की ऊर्जा सुरक्षा और सतत विकास के प्रयासों में एक बिल्कुल नया आयाम जोड़ती है। 2070 के 'नेट-जीरो' संकल्प को सिद्ध करने की दिशा में आगे बढ़ते भारत के लिए पृथ्वी के गर्भ से निकलने वाली यह अपार तापीय ऊर्जा भविष्य का एक स्थिर, स्वच्छ और पूरी तरह से स्वदेशी ऊर्जा स्तंभ बनेगी।

 


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