पोलियो उन्मूलन से आशा कार्यकर्ताओं तक: भारत की जन-स्वास्थ्य यात्रा, ऐतिहासिक सफलताएँ और आगे का रास्ता

02 Sep 2026
पोलियो उन्मूलन से आशा कार्यकर्ताओं तक: भारत की जन-स्वास्थ्य यात्रा, ऐतिहासिक सफलताएँ और आगे का रास्ता

दूर-दराज के गाँवों तक पहुँचती स्वास्थ्य सेवाएँ और वैश्विक पटल पर 'दुनिया की फार्मेसी' के रूप में उभरता भारत—एक ऐसी कहानी जहाँ अपार सफलताएँ और जमीनी चुनौतियाँ साथ-साथ चलती हैं।

 

 

जन-स्वास्थ्य के गलियारों में एक तस्वीर अक्सर चर्चा का विषय बनती है: चमकीली साड़ी पहने एक 'आशा' (ASHA) कार्यकर्ता, जो उस गाँव के आखिरी दरवाजे पर दस्तक दे रही है जहाँ सड़कें खत्म हो जाती हैं और मोबाइल सिग्नल तोड़ देते हैं। उसके बैग में आयरन की गोलियां, ओआरएस (ORS) के पैकेट, एक टीकाकरण कार्ड और एक डायरी है। सीधे शब्दों में कहें तो, वह दूर-दराज के नागरिकों और भारतीय स्वास्थ्य तंत्र के बीच की सबसे पहली और मजबूत कड़ी है—और पिछले बीस वर्षों के सबसे चतुर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगों में से एक।

भारत की स्वास्थ्य सेवा की कहानी पूरी तरह से सीधी या सिर्फ जीत की कहानी नहीं है, लेकिन इसके बावजूद इसमें आधुनिक इतिहास की कुछ सबसे असाधारण सफलताएँ दर्ज हैं।

पोलियो उन्मूलन की ऐतिहासिक मिसाल

दशकों तक पोलियो वायरस ने उपमहाद्वीप के लाखों बच्चों के जीवन को प्रभावित किया। इसके बाद दुनिया का सबसे जटिल और व्यापक टीकाकरण अभियान चलाया गया—जहाँ डोर-टू-डोर टीमें बनाई गईं, रेगिस्तानों और बाढ़ प्रभावित इलाकों में कोल्ड चेन पहुँचाई गई और मेलों व त्योहारों की भीड़ के बीच अभियान चलाए गए।

नतीजतन, भारत को आधिकारिक तौर पर पोलियो-मुक्त घोषित किया गया। 100 करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश ने वह कर दिखाया जिसे दुनिया के विशेषज्ञों ने असंभव मान लिया था। इस सफलता ने भारत को सिखाया कि जब सामुदायिक लामबंदी, प्रशिक्षित स्थानीय कार्यकर्ता और मजबूत इच्छाशक्ति एक साथ आते हैं, तो बड़े से बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।

सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम और मिशन इंद्रधनुष

भारत दुनिया के सबसे बड़े सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रमों (Universal Immunisation Programme) में से एक का संचालन करता है, जो देश भर में बच्चों और गर्भवती महिलाओं को टीबी, डिप्थीरिया, टेटनस, पोलियो, हेपेटाइटिस बी और खसरा जैसी घातक बीमारियों से सुरक्षा प्रदान करता है।

मिशन इंद्रधनुष: इस मिशन ने उन बच्चों और महिलाओं को लक्षित किया जो नियमित अभियानों से छूट जाते थे—विशेष रूप से सुदूर जिलों, शहरी झुग्गियों और हाशिए पर मौजूद समुदायों में।

सफलता व चुनौती: यद्यपि टीकाकरण का दायरा तेजी से बढ़ा है, लेकिन जन-स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि हर एक बच्चे तक समान रूप से 100% पहुँच सुनिश्चित करने का काम अभी भी जारी है।

आशा कार्यकर्ता: अंतिम छोर तक स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत शुरू की गई 'आशा' (Accredited Social Health Activist) योजना ने स्थानीय महिलाओं को प्रशिक्षित कर उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे अहम कड़ी बना दिया।

प्रमुख जिम्मेदारी: गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव के लिए अस्पतालों तक पहुँचाना और नवजात शिशुओं के टीकाकरण का हिसाब रखना।

सामुदायिक सलाह: परिवारों को पोषण, स्वच्छता और परिवार नियोजन पर जागरूक करना।

प्राथमिक पहचान: टीबी के लक्षणों की पहचान कर इलाज पूरा कराना और किसी भी बीमारी के प्रकोप की सबसे पहली सूचना देना।

यद्यपि आशा कार्यकर्ताओं को अपने मानदेय और औपचारिक दर्जे के लिए अक्सर संघर्ष करना पड़ता है और उनके काम का बोझ अधिक है, फिर भी ग्रामीण भारत में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सुधारने में उनका योगदान अतुलनीय रहा है।

आयुष्मान भारत और 'दुनिया की फार्मेसी'

'आयुष्मान भारत' योजना दो प्रमुख स्तंभों पर काम करती है: गरीब और जरूरतमंद परिवारों को मुफ्त कैशलेस इलाज की सुविधा देना और देश भर में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 'हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों' का नेटवर्क तैयार करना।

वैश्विक स्तर पर देखें तो भारत के जेनेरिक दवा उद्योग ने अफ्रीका और एशिया के देशों तक सस्ती दवाएँ पहुँचाई हैं। इसके अलावा, भारत की वैक्सीन निर्माण क्षमता दुनिया भर के लिए जीवनरक्षक साबित हुई है। 'दुनिया की फार्मेसी' (Pharmacy of the World) सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि भारत का वैश्विक योगदान है।

वे चुनौतियाँ जो आज भी बरकरार हैं

एक निष्पक्ष दृष्टिकोण के लिए उन कमियों को स्वीकार करना जरूरी है जो अभी दूर नहीं हुई हैं:

डॉक्टरों और संसाधनों की कमी: ग्रामीण भारत आज भी योग्य डॉक्टरों, स्वास्थ्य कर्मियों और आधुनिक उपकरणों की किल्लत से जूझ रहा है।

जेब से होने वाला भारी खर्च (Out-of-pocket spending): स्वास्थ्य पर होने वाले व्यक्तिगत खर्च के मामले में भारत अभी भी दुनिया में काफी ऊपर है, जिससे गंभीर बीमारी के समय आज भी कई परिवार आर्थिक संकट में फँस जाते हैं।

असमान गुणवत्ता: अलग-अलग राज्यों और सरकारी व निजी अस्पतालों के बीच इलाज की गुणवत्ता में भारी अंतर मौजूद है।

दरवाजे पर दस्तक देती वह आशा कार्यकर्ता एक ऐसे स्वास्थ्य तंत्र का हिस्सा है जो अभी पूरी तरह बनकर तैयार हो रहा है। यही कारण है कि उसकी हर कोशिश बेहद कीमती है।

 


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