बैगा आदिवासियों की अनूठी कला 'बीरन': विलुप्त होती सांस्कृतिक विरासत से आजीविका और उद्यमिता का नया मार्ग

22 Sep 2026
बैगा आदिवासियों की अनूठी कला 'बीरन': विलुप्त होती सांस्कृतिक विरासत से आजीविका और उद्यमिता का नया मार्ग

प्रकृति संरक्षण, परंपरा और महिला सशक्तीकरण के अनूठे संगम से छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में आकार ले रही है एक नई आर्थिक और सांस्कृतिक क्रांति।

 

 

छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले की सुरम्य मैकाल पर्वत श्रृंखला की तलहटी में बसा तरेगांव बैगा आदिवासियों का एक प्रमुख केंद्र है। प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव के लिए पहचाने जाने वाले बैगा समुदाय के जीवन में कला, परंपरा और पर्यावरण एक-दूसरे से रचे-बसे हैं। सांस्कृतिक पर्वों—जैसे दसरा, गिरदा और बैगा नृत्य—के अवसर पर बैगा पुरुष एवं महिलाएं एक विशेष प्रकार का आभूषण धारण करते हैं, जिसे 'बीरन' कहा जाता है।

बीरन केवल एक आभूषण या माला नहीं है; यह बैगा समुदाय के धैर्य, साधना और प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम का प्रतीक है। हालांकि, समय के साथ बदलते कृषि पैटर्न, घटते वन क्षेत्र और नई पीढ़ी के मोहभंग के कारण यह बेजोड़ हस्तशिल्प विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गया था। लेकिन आज, संगठित सामाजिक प्रयासों के बल पर यह विरासत बैगा महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता और उद्यमिता का नया जरिया बन रही है।

बीरन का निर्माण: प्रकृति और कौशल की अद्भुत साधना

बीरन तैयार करना अत्यंत सूक्ष्म और धैर्य का काम है। इसे बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है:

दुर्लभ प्राकृतिक घटक: बीरन को पारिजात वृक्ष की टहनी के रेशों और 'सूताखर' नामक जंगली घास के संयोजन से तैयार किया जाता है।

बारीक बुनाई और समय: बीरन की केवल एक छोटी रिंग तैयार करने में एक कुशल शिल्पकार को लगभग 5 मिनट का समय लगता है। एक पूरी माला में 60 से 80 रिंग आपस में पिरोए जाते हैं।

संकट का कारण: सूताखर घास केवल पारंपरिक कोदो-कुटकी (मिलेट्स) के खेतों में ही उगती है। हाल के वर्षों में बढ़ते एकल-फसल (मोनो-क्रॉपिंग) चलन के कारण यह घास दुर्लभ हो गई। वहीं, पारिजात के वृक्ष भी नदी-नालों के किनारे केवल एक-दो की संख्या में ही बचे रह गए थे, जिससे बीरन का अस्तित्व खतरे में पड़ गया था।

संरक्षण की ऐतिहासिक पहल: बीरन उत्सव और अभिसरण

संस्कृति को सहेजने और प्रकृति-संरक्षण की इस मुहिम की शुरुआत एक वर्ष पूर्व सामाजिक कार्यकर्ता पद्मश्री अर्जुन सिंह, बैगा समाज के प्रदेश अध्यक्ष इतवारी मछिया जी और ग्रामोदय ग्राम विकास समिति के संयुक्त प्रयासों से हुई। ग्रामोदय की उपाध्यक्ष श्रीमती कली बाई बैगा के अनुसार, केवल समुदाय के अकेले प्रयास से इसे सहेजना कठिन था; इसलिए शासकीय विभागों को इससे जोड़ना अनिवार्य समझा गया।

इस सोच ने जन्म दिया 'बीरन उत्सव' को, जो जिला मुख्यालय से करीब 90 किलोमीटर दूर मैकाल की पहाड़ियों के बीच आयोजित हुआ:

ऐतिहासिक अभिसरण (Convergence): पहली बार जिला पंचायत, आदिम जाति कल्याण विभाग, वन विभाग, बैंक, नाबार्ड और प्रशिक्षण केंद्रों के आला अधिकारी सीधे दूरस्थ आदिवासी गांव पहुंचे।

नीतिगत संकल्प: प्रशासन ने शासकीय योजनाओं के माध्यम से बीरन के संरक्षण, सूताखर घास और पारिजात के पौधारोपण तथा नई पीढ़ी को यह कौशल सिखाने का सामूहिक संकल्प लिया।

नई परंपरा की शुरुआत: आयोजनों में अतिथियों का स्वागत फूलों की माला के बजाय बीरन की पारंपरिक माला पहनाकर करने की एक नई और सम्मानजनक परंपरा शुरू की गई।

विरासत से उद्यमिता: पलायन रुका, घर बैठे मिला रोजगार

ग्रामोदय संस्था के चंद्रकांत यादव के मार्गदर्शन में बीरन हस्तशिल्प को व्यवस्थित आजीविका से जोड़ा गया है। छिंदपुर और पिपरहा गांवों की बैगा महिलाओं ने स्व-सहायता समूह बनाकर बीरन का व्यावसायिक उत्पादन और विपणन शुरू कर दिया है।

[बीरन हस्तशिल्प: पलायन से आत्मनिर्भरता का परिवर्तन]

 पहले स्थिति (पलायन की मजबूरी)                                                                                            वर्तमान स्थिति (बीरन हस्तशिल्प द्वारा) 

• मैदानी इलाकों में पलायन                                                                                                • अपने ही गांव व घर में सम्मानजनक कार्य

• गन्ने के खेतों में कठिन परिश्रम                                                                                           • सांस्कृतिक विरासत का जीवंत संरक्षण

• मात्र ₹300/दिन की दिहाड़ी                                                                                              • प्रति बीरन माला ₹300 का सीधा मूल्य

• परिवार से दूरी और शोषण का जोखिम                                                                                • पिछले 6 महीने में समूहों को ₹10,000+ की आय

 

बीरन बनाने वाली श्रीबाई दीदी भावुक होकर बताती हैं:

"रोजगार न होने से हमें परिवार से दूर मैदानी क्षेत्रों में जाना पड़ता था। वहां मात्र 300 रुपये मजदूरी के लिए गन्ने के खेतों में हाड़-तोड़ मेहनत करनी पड़ती थी। लेकिन अब हम अपने घर पर रहकर अपनी संस्कृति भी बचा रहे हैं और एक माला से 300 रुपये तक कमा भी रहे हैं।"

टिकाऊ भविष्य के लिए पर्यावरण संरक्षण की नींव

बीरन को निरंतरता देने के लिए बैगा महिलाएं केवल माला ही नहीं बना रहीं, बल्कि इसके पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) को भी पुनर्जीवित कर रही हैं:

सूताखर घास का पुनरुद्धार: महिलाओं ने मिलेट्स (कोदो-कुटकी) की खेती को पुन: बढ़ावा देना शुरू किया है, ताकि सूताखर घास स्वाभाविक रूप से उग सके।

पारिजात नर्सरी: पारिजात के पेड़ों की संख्या बढ़ाने के लिए विशेष नर्सरी तैयार की गई है, जिससे वृक्षारोपण किया जा सके।

बैगा आदिवासियों का यह प्रयास साबित करता है कि जब पारंपरिक ज्ञान, पर्यावरण चेतना और आधुनिक आजीविका मॉडल एक साथ आते हैं, तो विलुप्त होती कलाएं भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ बन सकती हैं।


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