विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (वीबी-ग्राम जी) अधिनियम, 2025: मनरेगा में सुधार या अधिकार-आधारित आजीविका पर प्रहार?
2005 के ऐतिहासिक मनरेगा कानून की जगह लेने वाले नए ‘वीबी-ग्राम जी अधिनियम, 2025’ को लेकर देश में एक नई बहस छिड़ गई है।
जहां एक तरफ केंद्र सरकार इसे मनरेगा की ढांचागत कमियों को दूर करने वाला एक प्रगतिशील सुधार मान रही है, वहीं दूसरी तरफ आलोचक इसे ग्रामीण गरीबों के वैधानिक अधिकारों को सीमित करने वाला कदम बता रहे हैं। आइए समझते हैं इस कानून के मुख्य प्रावधानों और इसके दूरगामी प्रभावों का निष्पक्ष विश्लेषण।
सुधार की पृष्ठभूमि और विधायी प्रक्रिया पर सवाल
वीबी-ग्राम जी अधिनियम को संसद में काफी तेजी से आगे बढ़ाया गया। इसे 18 दिसंबर, 2025 को लोकसभा द्वारा पारित किया गया और तीन दिनों के भीतर राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई।
सहकारी संघवाद की अनदेखी: आलोचकों का आरोप है कि कानून लागू करने से पहले राज्यों से कोई सार्वजनिक पूर्व-परामर्श नहीं किया गया। चूंकि ग्रामीण रोजगार योजनाओं का प्राथमिक क्रियान्वयन राज्यों को ही करना होता है, इसलिए यह चिंता का विषय है।
संसदीय समीक्षा का अभाव: कानून को किसी संसदीय स्थायी समिति या संयुक्त समिति के पास समीक्षा के लिए नहीं भेजा गया, जो ऐसे बड़े और व्यापक वित्तीय प्रभावों वाले सुधारों के लिए एक स्थापित परिपाटी रही है।
कानून में बदलाव: अधिकार-आधारित गारंटी से 'योजना' की ओर?
नया अधिनियम मनरेगा के कई मूल सिद्धांतों में महत्वपूर्ण बदलाव करता है, जिन्हें लेकर विवाद गहराया हुआ है:
ओपन-एंडेड फंडिंग की जगह 'मानक आवंटन': मनरेगा एक मांग-संचालित (demand-driven) और सार्वभौमिक योजना थी, जहां रोजगार की मांग के अनुसार बजट आवंटित होता था। नए कानून (धारा 4(5) व 22(4)) के तहत अब केंद्र सरकार राज्य-वार 'मानक आवंटन' तय करेगी। इससे यह एक आपूर्ति-सीमित केंद्र प्रायोजित योजना में बदल सकती है।
राज्यों पर बढ़ा वित्तीय बोझ (60:40 अनुपात): धारा 22(2) के तहत व्यय में राज्यों का हिस्सा 10% से बढ़ाकर 40% कर दिया गया है (पूर्वोत्तर और पर्वतीय राज्यों को छोड़कर)। इससे राज्यों के वित्तीय बजट पर भारी अतिरिक्त भार पड़ेगा।
सार्वभौमिकता पर असर: धारा 5(1) केंद्र को उन क्षेत्रों को अधिसूचित करने की शक्ति देती है जहां यह गारंटी लागू होगी। स्पष्ट सिद्धांतों के अभाव में मनमाने या राजनीतिक निष्कासन का खतरा जताया जा रहा है।
पीक कृषि सीजन में दो महीने का पूर्ण प्रतिबंध: धारा 6(1) व 6(2) बुवाई और कटाई के व्यस्त कृषि सीजन में 60 दिनों के लिए काम बंद रखने का प्रावधान करती है। आलोचकों का मानना है कि इससे ग्रामीण श्रमिकों के पास न्यूनतम मजदूरी हासिल करने का 'सार्वजनिक विकल्प' (public option) खत्म हो जाएगा और वे बड़े भूस्वामियों पर निर्भर होने को मजबूर होंगे।
सरकार का पक्ष: क्यों जरूरी था पूर्ण प्रतिस्थापन?
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार, दो दशक पुराने मनरेगा ढांचे को 'विकसित भारत @2047' के विजन के अनुकूल बनाना आवश्यक था:
125 दिन का रोजगार: गारंटीकृत कार्य दिवसों की संख्या को प्रति वर्ष 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है।
संतुलित क्षेत्रीय आवंटन: पुराने ढांचे में तमिलनाडु और केरल जैसे अपेक्षाकृत कम गरीबी वाले राज्यों को मनरेगा निधि का बड़ा हिस्सा मिल जाता था, जबकि बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे अधिक गरीबी वाले राज्य अपनी प्रशासनिक क्षमता की कमी के कारण कम हिस्सा पाते थे। 'मानक आवंटन' व्यवस्था इस असमानता को दूर करने के लिए बनाई गई है।
चार विषयगत क्षेत्र: कार्यों को जल सुरक्षा, बुनियादी ग्रामीण ढांचा, आजीविका परिसंपत्तियां, और जलवायु एवं आपदा सुरक्षा में वर्गीकृत किया गया है।
डिजिटल निगरानी: फर्जी जॉब कार्ड और लीकेज रोकने के लिए बायोमेट्रिक पहचान, मोबाइल ऐप, जियोस्पेशियल मैपिंग और सख्त सोशल ऑडिट अनिवार्य किया गया है।
क्या मनरेगा की पुरानी कमियां दूर होंगी?
| पुरानी समस्या (मनरेगा) | नए कानून (वीबी-ग्राम जी) का समाधान | जमीनी चुनौती और सीमाएं |
|---|---|---|
| क्षेत्रीय असंतुलन (गरीब राज्यों को कम फंड) | मानक आवंटन (Standard Allocation) का प्रावधान | केवल आवंटन बढ़ाने से फायदा नहीं होगा; जब तक बिहार व यूपी जैसे राज्यों में प्रशासनिक क्षमता नहीं बढ़ेगी, वे फंड का उपयोग नहीं कर पाएंगे। |
| परिसंपत्तियों की गुणवत्ता | समवर्ती मूल्यांकन और राज्य-स्तरीय गुणवत्ता नियंत्रण टीमें | गुणवत्ता में सुधार कागजी नियमों के बजाय धरातल पर निष्पादन क्षमता पर निर्भर करेगा। |
| मजदूरी में देरी | 15 दिनों के भीतर भुगतान के कड़े वैधानिक नियम | आधारभूत प्रक्रियाओं और नौकरशाही की अड़चनों को बदले बिना केवल कानून बनाने से देरी खत्म होना अनिश्चित है। |
| फर्जी कार्ड और भ्रष्टाचार | अनिवार्य डिजिटल टूल्स, जियो-टैगिंग और बायोमेट्रिक्स | नेटवर्क समस्या और तकनीकी रुकावटों से वास्तविक और गरीब ग्रामीण मजदूरों के वंचित होने का खतरा बना रहता है। |
भविष्य की जरूरत: एक छूटा हुआ अवसर?
21वीं सदी की बदलती अर्थव्यवस्था और विकसित भारत @2047 के लक्ष्य को देखते हुए, ग्रामीण भारत की निर्भरता केवल अकुशल शारीरिक श्रम (unskilled manual labor) पर ही सीमित नहीं रहनी चाहिए थी।
केयर इकोनॉमी (Care Economy) का अभाव: नए कानून में ग्रामीण सेवा क्षेत्र—जैसे ग्राम पुस्तकालय, आंगनवाड़ी, शिशु गृह (creches), बुजुर्गों की देखभाल और स्वास्थ्य सेवा सहायकों के पदों को जोड़ने का अवसर था, जिससे ग्रामीण महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी बढ़ सकती थी।
कौशल विकास: केवल शारीरिक श्रम कराने के बजाय ग्रामीण युवाओं के व्यवस्थित कौशल विकास (skilling) को रोजगार गारंटी से जोड़ा जा सकता था।
निष्कर्ष
वीबी-ग्राम जी अधिनियम जहां एक तरफ आवंटन में पारदर्शिता और डिजिटल निगरानी के जरिए पुरानी व्यवस्थागत कमियों को ठीक करने का प्रयास करता है, वहीं दूसरी तरफ यह अधिकार-आधारित आजीविका सुरक्षा और राजकोषीय संघवाद (fiscal federalism) के सामने नई चुनौतियां खड़ी करता है। इस कानून की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि केंद्र सरकार राज्यों के राजकोषीय हितों की रक्षा करते हुए गरीब राज्यों की प्रशासनिक क्षमता बढ़ाने में कितनी मदद करती है।