जलवायु आपातकाल की आहट: स्वास्थ्य संकट, कटते जंगल और चरम मौसम से जूझती धरती
पर्यावरण दिवस अब केवल जागरूकता का माध्यम नहीं, बल्कि त्वरित 'जलवायु कार्रवाई' का अंतिम चेतावनी पत्र है।
हर साल 5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस (शुरुआत: 1973, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम) आज एक वैश्विक चेतावनी बन चुका है। इस वर्ष यह दिवस "जलवायु कार्रवाई" थीम के तहत मनाया जा रहा है, जो यह स्पष्ट करता है कि अब केवल बातों और भाषणों का समय बीत चुका है—अब ठोस और असरदार कदम उठाना अनिवार्य है।
मानवजनित गतिविधियों के कारण हर साल वातावरण में लगभग 38 अरब टन CO2 छोड़ी जा रही है। जंगल और महासागर आधी CO2 तो सोख लेते हैं, लेकिन बाकी हिस्सा हवा में जमा होकर वैश्विक तापमान (Global Warming) को लगातार बढ़ा रहा है।
युद्ध का अनदेखा 'कार्बन footprint'
उद्योगों और परिवहन के अलावा, आधुनिक युद्ध भी पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुँचा रहे हैं। एक हालिया अध्ययन के अनुसार:
रूस-यूक्रेन युद्ध के शुरुआती चार वर्षों में लगभग 31.1 करोड़ टन CO2 के बराबर उत्सर्जन हुआ।
यह उत्सर्जन फ्रांस जैसे बड़े औद्योगिक देश के कुल वार्षिक उत्सर्जन के बराबर है।
भारत की चिंताजनक तस्वीर: 'स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026'
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (CSE) की ताजा रिपोर्ट भारत में गहराते पर्यावरणीय संकट को उजागर करती है:
| पर्यावरणीय आयाम | रिपोर्ट के मुख्य आंकड़े व तथ्य |
|---|---|
| जंगलों की कटाई | 2020-21 से 2024-25 के बीच 97,000 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वन कार्यों के लिए मंजूरी दी गई। |
| मानव-वन्यजीव संघर्ष | 10 राज्यों में हाथियों के हमले बढ़े; 2025 के शुरुआती 6 महीनों में बाघों के हमलों से 40 मौतें दर्ज की गईं। |
| चरम मौसम (2025) | लगभग हर दिन चरम मौसम दर्ज; 1.74 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि प्रभावित हुई। |
| पर्यावरणीय न्यायालय | अदालतों में पर्यावरण से जुड़े 99,000 से अधिक मामले लंबित हैं। |
बढ़ता स्वास्थ्य संकट और भावी राह
जलवायु परिवर्तन अब सीधे तौर पर जनस्वास्थ्य के लिए खतरा बन गया है। दक्षिण-पूर्व एशिया में भीषण लू (Heatwave), जल संकट और जहरीली हवा से मौतों का आंकड़ा तेजी से बढ़ा है, जिसका सबसे ज्यादा शिकार बच्चे और बुजुर्ग हो रहे हैं।
पर्यावरण संरक्षण अब किसी सरकार या संस्था की अकेली जिम्मेदारी नहीं है। जब तक हर नागरिक वृक्षारोपण, जल संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और टिकाऊ जीवनशैली (Sustainable Lifestyle) को अपने दैनिक जीवन में शामिल नहीं करेगा, तब तक इस संकट से उबर पाना असंभव है।