क्या आपकी थाली में सजा 'अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड' आपके दिमाग को कर रहा है कमजोर
स्वाद और सहूलियत का यह शॉर्टकट छीन सकता है आपकी मानसिक सेहत; वैश्विक शोध में सामने आए चौंकाने वाले संकेत।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में पैकेटबंद स्नैक्स, मीठे पेय, इंस्टेंट नूडल्स, फ्रोजन फूड और रेडी-टू-ईट खाना तेजी से हमारी रोजमर्रा की थाली का मुख्य हिस्सा बनते जा रहे हैं। खाने में आसान, स्वादिष्ट और समय बचाने वाले ये खाद्य पदार्थ दिखने में जितने सुविधाजनक हैं, सेहत के लिहाज से उतने ही चिंताजनक। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए एक नए अध्ययन ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह सहूलियत उम्र बढ़ने के साथ हमारे दिमाग पर भारी पड़ सकती है?
जर्नल की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
प्रतिष्ठित जर्नल एनुअल रिव्यू ऑफ न्यूट्रिशन में प्रकाशित एक वैश्विक अध्ययन ने अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड और दिमागी सेहत के रिश्तों को लेकर गंभीर चिंताएं जताई हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन (Ultra-Processed Food) के सेवन और अवसाद, डिमेंशिया, मस्तिष्क के आकार में सिकुड़न तथा सोचने-समझने की क्षमता (Cognitive Decline) में गिरावट के बीच गहरे संकेत मिले हैं। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि वर्तमान प्रमाण अभी सीधे तौर पर यह साबित नहीं करते कि यह भोजन सीधे मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाता है, लेकिन जोखिम के स्पष्ट संकेत जरूर मिलते हैं।
वैश्विक वैज्ञानिकों की टीम ने किया गहन विश्लेषण
लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी के 'पेनिंगटन बायोमेडिकल रिसर्च सेंटर' से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक ओवेन कारमाइकल और उनके साथ अमेरिका, यूरोप, एशिया, अफ्रीका व ऑस्ट्रेलिया के 26 शोधकर्ताओं की टीम ने दुनिया भर के अध्ययनों की व्यापक समीक्षा की। इस विश्लेषण में मानव अध्ययनों, मस्तिष्क स्कैन और पशु प्रयोगों के आंकड़ों को एक साथ मिलाकर समझा गया कि विज्ञान इस विषय पर अब तक क्या जानता है और किन पहलुओं पर शोध होना बाकी है।
आखिर क्या होता है अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड?
विशेषज्ञों के अनुसार, हर पैकेटबंद या डिब्बाबंद खाना अल्ट्राप्रोसेस्ड नहीं होता। अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड वे होते हैं जिन्हें औद्योगिक स्तर पर कई जटिल रासायनिक व भौतिक प्रक्रियाओं से तैयार किया जाता है। इनमें आमतौर पर शामिल होते हैं:
अतिरिक्त अवयव: रिफाइंड सामग्री, अत्यधिक चीनी, वसा और नमक।
कृत्रिम तत्व: रंग, फ्लेवर, आर्टिफिशियल स्वीटनर, इमल्सीफायर और प्रिजर्वेटिव।
पोषक तत्वों की कमी: प्रसंस्करण की प्रक्रिया में भोजन के प्राकृतिक फाइबर, आवश्यक विटामिन और पौधों से मिलने वाले उपयोगी फाइटोन्यूट्रिएंट्स नष्ट हो जाते हैं।
प्रमुख उदाहरण: वातित मीठे पेय (सॉफ्ट ड्रिंक्स), पैकेज्ड स्नैक्स, इंस्टेंट नूडल्स, फ्रोजन मील और प्रोसेस्ड मीट।
दुनिया भर में बढ़ता खतरा: वैश्विक आंकड़े
शोध से पता चलता है कि दुनिया के अलग-अलग देशों में अल्ट्राप्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की खपत चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी है:
| देश | दैनिक कैलोरी में अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड का हिस्सा |
|---|---|
| अमेरिका | 55% - 58% |
| ऑस्ट्रेलिया | 42% |
| ब्राजील | 21.5% |
भारत जैसे विकासशील देशों में भी इनका चलन तेजी से बढ़ रहा है। अब ये खाद्य पदार्थ कभी-कभार खाए जाने वाले स्नैक न होकर, लोगों की दैनिक खुराक का बड़ा हिस्सा बनते जा रहे हैं।
सोचने और याद रखने की क्षमता पर असर
अध्ययन के दौरान अवसाद और मानसिक तनाव पर सबसे ज्यादा प्रभाव देखा गया। ब्राजील में 10,775 वयस्कों पर लगभग आठ वर्षों तक किए गए एक दीर्घकालिक अध्ययन में देखा गया कि जिन लोगों की दैनिक कैलोरी में 19.9% से अधिक हिस्सा अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड का था, उनमें निर्णय लेने, योजना बनाने और सामान्य सोचने-समझने की क्षमता में दूसरों के मुकाबले काफी तेज गिरावट दर्ज की गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि यद्यपि इस क्षेत्र में अभी और शोध की आवश्यकता है, लेकिन अपनी थाली में प्राकृतिक और ताजे खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देना दिमागी सेहत को सुरक्षित रखने की दिशा में पहला ठोस कदम साबित हो सकता है।
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