सौर क्रांति के दौर में पुराने PPA का बोझ: बिजली सस्ती करने की राह में नए आर्थिक रोड़े
'लंबे बिजली खरीद समझौते और दिन में 80 GW तक सरप्लस कोयला क्षमता: उपभोक्ताओं की जेब पर मंडराता नया खतरा'
भारत एक बड़े और अभूतपूर्व ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) के दौर से गुजर रहा है। देश में सौर और पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता जिस तेजी से बढ़ रही है, उससे स्वच्छ ऊर्जा का सपना तो साकार होता दिख रहा है, लेकिन इसके साथ ही एक गंभीर आर्थिक संकट भी जन्म ले रहा है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की नवीनतम रिपोर्ट ‘बियॉन्ड बेसलोड: रिफॉर्मिंग थर्मल पीपीएज फॉर इंडियाज एनर्जी ट्रांजिशन’ के अनुसार, कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से जुड़े पुराने और कठोर 'बिजली खरीद समझौते' (Power Purchase Agreements - PPA) अब भारत के ऊर्जा बदलाव की राह में एक बड़ा रोड़ा और डिस्कॉम्स (Discoms) व उपभोक्ताओं पर बेवजह का वित्तीय बोझ साबित हो रहे हैं।
क्या है PPA और क्यों खड़ा हो रहा है संकट?
बिजली खरीद समझौता (PPA) डिस्कॉम और बिजली उत्पादक कंपनियों के बीच एक दीर्घकालिक अनुबंध होता है। इसमें एक निश्चित मूल्य पर लंबे समय (आमतौर पर 25 साल) तक बिजली खरीदने और उपलब्धता बनाए रखने की शर्तें तय होती हैं।
बदलती स्थिति: पहले कोयला संयंत्र लगातार (Base Load) चलाए जाते थे। लेकिन अब दिन के समय सौर ऊर्जा की भारी उपलब्धता के कारण थर्मल पावर प्लांट की मांग घट जाती है।
तय लागत का भारी बोझ: दिन के समय भले ही कोयला बिजलीघर अपनी क्षमता का बेहद कम इस्तेमाल करें, फिर भी अनुबंधित शर्तों के कारण डिस्कॉम्स को उनकी 'फिक्स्ड कॉस्ट' या क्षमता शुल्क (Capacity Charges) का भुगतान करना ही पड़ता है।
लागत में बढ़ोतरी: इस्तेमाल कम होने के बावजूद तय शुल्क का भुगतान करने से प्रति यूनिट बिजली की वास्तविक लागत बढ़ जाती है, जिसका अंतिम असर आम उपभोक्ता के बिजली बिल पर पड़ता है।
द लैंसेट जैसी रिपोर्ट की तरह CSE के चौंकाने वाले आंकड़े
सीएसई द्वारा आठ राज्यों से सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त 67.1 गीगावाट (GW) क्षमता के PPA विश्लेषण से बेहद गंभीर तथ्य सामने आए हैं:
| मुख्य बिंदु | आंकड़े व स्थिति |
|---|---|
| सौर बनाम कोयला अनुपात | 2019-20 में कोयले की 19 यूनिट पर सौर ऊर्जा की 1 यूनिट थी; आज कोयले की हर 7 यूनिट पर सौर ऊर्जा की 1 यूनिट उत्पादित हो रही है। |
| सरप्लस क्षमता (दिन के समय) | सौर उत्पादन के चरम समय में कोयला आधारित बिजली की 80 GW तक क्षमता अतिरिक्त (Unutilized) रह सकती है। |
| दीर्घकालिक बंधन | अध्ययन किए गए PPA में से 6.1 GW क्षमता 2040 और उसके बाद तक के कठोर अनुबंधों में बंधी है। |
| 'टोल-गेट' प्रभाव | कोयला संयंत्रों का कर्ज आमतौर पर 10-12 वर्षों में चुक जाता है, लेकिन 25 साल के PPA के कारण अगले 13-15 वर्षों तक निश्चित रिटर्न और भुगतान जारी रहता है। |
'सस्ती बिजली' के दावे के पीछे छिपा भुगतान का जाल
रिपोर्ट में PPA की अवधि को लेकर एक बड़े वित्तीय विरोधाभास का खुलासा किया गया है:
कागजी राहत: यदि किसी PPA की अवधि 11 साल से बढ़ाकर 25 साल की जाती है, तो सालाना क्षमता शुल्क कम दिखाई देता है (लगभग 70 से 114 पैसे प्रति यूनिट की कमी)।
वास्तविक वित्तीय बोझ: भले ही सालाना टैरिफ कम दिखे, लेकिन 25 वर्षों की लंबी अवधि तक बंधे रहने के कारण उपभोक्ताओं को कुल मिलाकर दोगुने से भी अधिक भुगतान करना पड़ता है।
ईंधन समझौते (FSA): लंबे समय के लिए किए गए कोयला आपूर्ति समझौते भी एक दूसरी तकनीकी व व्यावसायिक जकड़न पैदा कर रहे हैं, जो संयंत्रों के कम चलने पर भी वित्तीय नुकसान पहुंचाते हैं।
विशेषज्ञ का रुख:
"भारत की स्थापित गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता 50% से ऊपर जा रही है। ऐसे में यदि हमने अनुबंधों और टैरिफ ढांचे को नए सिरे से डिजाइन नहीं किया, तो हमें पर्यावरणीय लाभ तो मिलेंगे, लेकिन उपभोक्ताओं पर अनावश्यक वित्तीय भार बढ़ता जाएगा।"
— पार्थ कुमार, प्रोग्राम मैनेजर, CSE
सुधार का रोडमैप: CSE की प्रमुख सिफारिशें
अस्पताल पहुँचने से पहले बीमारी की रोकथाम की तरह, ग्रिड के पूरी तरह ठप्प या महंगे होने से पहले PPA में सुधार अनिवार्य है। रिपोर्ट में निम्नलिखित कानूनी व सहयोगात्मक रास्ते सुझाए गए हैं:
मॉडल PPA का आधुनिकीकरण: अनुबंधों में परिचालन दक्षता, उत्सर्जन दर और सौर/गैर-सौर घंटों की अलग-अलग ग्रिड आवश्यकताओं को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।
अनिवार्य नियमित समीक्षा: डिस्कॉम्स के लिए थर्मल अनुबंधों की समय-समय पर समीक्षा करना कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया जाए।
आपसी सहमति से अनुबंध समाप्ति (Exit Clause): निष्पक्ष और पारदर्शी रूप से PPA से बाहर निकलने या पुनः बातचीत (Renegotiation) के लिए एक स्पष्ट मानक ढांचा बने, जिसमें मुआवजा केवल वास्तविक और असूल न हुई लागत तक सीमित रहे।
प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन: सभी संयंत्रों को एक जैसा फिक्स्ड चार्ज देने के बजाय, कम उत्सर्जन और उच्च दक्षता वाले संयंत्रों को 'मेरिट ऑर्डर डिस्पैच' में प्राथमिकता दी जाए।
निष्कर्ष
भारत का बिजली क्षेत्र सरकारी निकायों और डिस्कॉम्स के मजबूत नेटवर्क पर आधारित है। ऐसे में कानूनी विवादों में उलझने के बजाय Tata Mundra UMPP जैसे उदाहरणों से सीख लेकर आपसी सहमति से PPA का पुनर्गठन एक व्यावहारिक मार्ग है। जब तक पुराने और कठोर PPA में सुधार नहीं होगा, तब तक स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा का लाभ आम जनता तक पूरी तरह नहीं पहुँच सकेगा।
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