सामुदायिक आत्मनिर्भरता और स्व-प्रबंधन की मिसाल: 'जबर्रा' गांव का पारंपरिक रप्टा निर्माण

12 Sep 2026
सामुदायिक आत्मनिर्भरता और स्व-प्रबंधन की मिसाल: 'जबर्रा' गांव का पारंपरिक रप्टा निर्माण

बिना किसी सरकारी सहायता और बिना इंजीनियरों के, छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के जबर्रा गांव के ग्रामीण 24 वर्षों से अपने पारंपरिक ज्ञान और सामूहिक श्रमदान के बल पर बना रहे हैं नदी पर रप्टा।

 

 

छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के जबर्रा गांव के मुहाने पर बहने वाली काजल नदी पर इन दिनों निर्माणाधीन रप्टे का कार्य युद्ध स्तर पर चल रहा है। इस रप्टे के बनने से न केवल ग्रामीणों की आवाजाही आसान होती है, बल्कि यह उनकी आजीविका को भी सीधे तौर पर सहारा देता है।

1. सामूहिक श्रमदान और ग्राम वन प्रबंधन समिति का ढांचा

जबर्रा गांव में रप्टा निर्माण का कार्य पूरी तरह से सामुदायिक सहभागिता और ग्राम वन प्रबंधन समिति के दिशानिर्देशों पर आधारित है:

समान सहभागिता: रप्टा निर्माण की शुरुआत से अंत तक गांव के प्रत्येक घर से प्रतिदिन एक सदस्य का आना अनिवार्य है।

लैंगिक समानता: समिति यह सुनिश्चित करती है कि श्रमदान में पुरुषों और महिलाओं की संख्या 50-50% (आधा-आधा) हो।

लागत का बंटवारा: निर्माण पर होने वाले खर्च (जैसे जेसीबी मशीन का किराया) का आकलन कर प्रति घर राशि तय की जाती है। इस वर्ष प्रति घर ₹500 निर्धारित किया गया है, जो 100 घरों के हिसाब से ₹50,000 की कुल राशि बनती है।

"यह काम तो हम हर बरस करते हैं, तभी जाकर दो पैसे की बचत हो पाती है; नहीं तो दूसरी ओर अपनी जंगल की उपज बेचने जाते हैं तो हमारा आधा पैसा तो गाड़ी पर खर्च हो जाता है।"

बीरझा सोरी (60 वर्ष), स्थानीय ग्रामीण

2. इंजीनियरिंग पर भारी पारंपरिक ज्ञान

ग्रामीण पिछले 24 वर्षों से बिना किसी सरकारी इंजीनियर की मदद के अपने पारंपरिक ज्ञान के आधार पर इस रप्टे का निर्माण कर रहे हैं।

निर्माण तकनीक: बहती नदी को नुकसान पहुँचाए बिना जंगली घासों के बोझ बिछाए जाते हैं और फिर जेसीबी मशीन से मिट्टी डालकर समतल किया जाता है।

जल निकासी का सिद्धांत: रप्टे की संरचना ऐसी रखी जाती है कि नदी में पानी का स्तर बढ़ने पर अतिरिक्त पानी आसानी से रप्टे के ऊपर से बह जाए।

दूरी में भारी कमी: इस रप्टे के बनने से आसपास की 15 ग्राम पंचायतों की गरियाबंद जिला और नगरी ब्लॉक तक की दूरी 36 से 40 किलोमीटर तक कम हो जाती है।

3. आजीविका और वनोपज व्यापार का यथार्थ

जबर्रा गांव में 6 महीने का खर्च पूरी तरह से जंगल की उपज (अक्टूबर से मार्च) पर निर्भर है। गांव में कोई निजी नौकरी नहीं है और सरकारी नौकरी के नाम पर केवल एक व्यक्ति चपरासी के पद पर है।

व्यापार माध्यमहिस्सा (%)मुख्य कारण और चुनौतियाँ
खुला (हाट) बाजार80%तुरंत नकद (Cash) भुगतान, बेहतर दाम, और कोई कागजी अड़चन नहीं।
सरकारी खरीद20%बैंक खातों में देरी से पैसा आना, साक्षरता की कमी के कारण पासबुक न देख पाना, और पत्तलों/वनोपज में गुणवत्ता के नाम पर rejection (छंटनी)।

महिलाओं की अग्रणी भूमिका: जंगलों से वनोपज (जैसे जिमीकंद ₹40/किग्रा, करुकांदा ₹60/किग्रा) एकत्रित करने और उसे तैयार करने का मुख्य काम महिलाएं ही करती हैं।

सरकारी खरीद का दायरा: छत्तीसगढ़ राज्य में वर्ष 2024-25 के दौरान 67 प्रकार की वनोपज की खरीद की जा रही है (वर्ष 2001 में यह केवल 7 थी), जिसमें से जबर्रा क्षेत्र में 19 प्रकार की वनोपज सरकार खरीदती है।

निष्कर्ष:

जबर्रा गांव का यह प्रयास दिखाता है कि जब सरकारी बुनियादी ढांचा अंतिम छोर तक नहीं पहुंच पाता, तब ग्रामीण अपने पारंपरिक ज्ञान, श्रमदान और सामूहिक शक्ति के बल पर अपनी राह खुद बनाते हैं। हालांकि, नकद भुगतान की व्यवस्था और आसान बैंक सेवाओं का अभाव अभी भी उनकी आजीविका की एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।


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