डिग्रियों का अंबार लेकिन अवसरों का अकाल: 'भारत में कामकाज की स्थिति' रिपोर्ट ने उजागर किया शिक्षा-रोजगार का गहरा असंतुलन

12 Sep 2026
डिग्रियों का अंबार लेकिन अवसरों का अकाल: 'भारत में कामकाज की स्थिति' रिपोर्ट ने उजागर किया शिक्षा-रोजगार का गहरा असंतुलन

अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी द्वारा जारी विस्तृत अध्ययन के अनुसार, कॉलेजों और आईटीआई की भारी वृद्धि तथा उच्च नामांकन के बावजूद कौशल की कमी, अधूरा रोजगार और घटते अवसर देश के जनसांख्यिकीय लाभांश पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहे हैं।

 

 

भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक होने पर गर्व महसूस करता है, लेकिन जब यही शिक्षित युवा सड़कों पर रोजगार के लिए संघर्ष करते हैं, तो जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का सपना एक गंभीर संकट में बदलता नजर आता है। हाल ही में अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी द्वारा जारी ‘भारत में कामकाज की स्थिति’ रिपोर्ट ने देश के श्रम बाजार और उच्च शिक्षा के बीच की इस कड़वी सच्चाई को उजागर किया है।

शिक्षा का विस्तार: सकारात्मक रुझान और विडंबना

पिछले चार दशकों में भारत में उच्च शिक्षा का दायरा तेजी से बढ़ा है, लेकिन इस प्रगति के साथ एक गहरी असमानता भी सामने आई है।

उच्च नामांकन दर: उच्च शिक्षा में नामांकन दर बढ़कर 28% तक पहुँच गई है, जिसमें महिलाओं की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

पुरुषों के नामांकन में गिरावट: पुरुषों का नामांकन 2017 के 38% से घटकर 2024 के अंत तक 34% पर आ गया है, क्योंकि युवा वयस्क समय से पहले पारिवारिक जरूरतों के लिए आय के साधन तलाशने लगते हैं।

संस्थानों की वृद्धि: 2010 से 2021 के बीच प्रति लाख युवाओं पर कॉलेजों की संख्या 29 से बढ़कर 45 हो गई है, जबकि आईटीआई (ITI) की संख्या में 300% की वृद्धि हुई है।

रोजगार का संकट: आँकड़ों के आइने में युवा असंतोष

सूचक / मानकरिपोर्ट के आंकड़ेमुख्य समस्या / निहितार्थ
20-29 वर्ष के स्नातक6.3 करोड़ में से 1.1 करोड़ बेरोजगारडिग्रियाँ हासिल करने के बावजूद रोजगार का अभाव।
15-25 वर्ष में बेरोजगारीलगभग 40%युवा आबादी के शुरुआती कार्य-वर्षों में अवसर न मिलना।
स्थायी वेतन वाली नौकरीकेवल 7% (स्नातक के 1 वर्ष के भीतर)अधिकांश नौकरियाँ अस्थायी, अनुबंध आधारित या कम वेतन वाली हैं।
गरीब परिवारों की भागीदारी2007 में 8% से बढ़कर 2017 में 15%शिक्षा पहुँच रही है, लेकिन महंगे कोर्स और बेहतर नौकरियां संपन्न वर्ग तक सीमित हैं।

मुख्य चुनौतियाँ: 'अधूरा रोजगार' और कौशल अंतराल

अधूरा रोजगार (Underemployment): केवल बेरोजगारी ही नहीं, बल्कि योग्यताओं से नीचे काम करना भी बड़ी समस्या है। कई इंजीनियरिंग स्नातक डिलीवरी बॉय, डेटा एंट्री या अस्थायी काम करने को विवश हैं, जिससे राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी हो रही है।

डिग्री केंद्रित शिक्षा: संस्थानों की संख्या बढ़ने के बावजूद शिक्षक-छात्र अनुपात चिंताजनक है और छात्रों में उद्योग जगत की माँग (Industry Demand) के अनुरूप कौशल (Skills) का अभाव है।

सीमित समय सीमा (Closing Window): रिपोर्ट चेतावनी देती है कि वर्ष 2030 के बाद कार्यशील आबादी का अनुपात घटने लगेगा। यानी भारत के पास इस लाभांश को भुनाने के लिए बेहद सीमित समय बचा है।

समाधान: नीतिगत सुधारों के 5 मुख्य स्तंभ

शिक्षा और उद्योग का तालमेल: शैक्षणिक पाठ्यक्रमों को वास्तविक बाजार की जरूरतों के हिसाब से अपडेट किया जाए।

गुणवत्तापूर्ण कौशल विकास: आईटीआई और अन्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों की गुणवत्ता में सुधार कर 'कौशल केंद्रित' शिक्षा को प्राथमिकता दी जाए।

रोजगार-आधारित आर्थिक नीतियां: केवल जीडीपी (GDP) वृद्धि दर पर ध्यान देने के बजाय रोजगार सृजन को नीति के केंद्र में रखा जाए।

उद्यमिता (Entrepreneurship) को बढ़ावा: युवाओं को सिर्फ जॉब-सीकर के बजाय 'जॉब-क्रिएटर' बनाने के लिए वित्तीय और ढांचागत प्रोत्साहन मिले।

सामाजिक व क्षेत्रीय समानता: वंचित और गरीब तबके के शिक्षित युवाओं के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने हेतु लक्षित नीतियां बनाई जाएं।

निष्कर्ष:

यदि शिक्षा और रोजगार के बीच के इस अंतर को तुरंत नीतिगत सुधारों से नहीं भरा गया, तो भारत का सबसे बड़ा संसाधन (युवा आबादी) ही उसकी सबसे बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती बन सकता है।


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