खेतों में उपजती असमानता: भारत के गांवों में 46% परिवार भूमिहीन, 1% अमीरों के पास 18% जमीन
वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब की रिपोर्ट में खुलासा: ऐतिहासिक औपनिवेशिक नीतियां, सामाजिक ढांचा और उपजाऊ भूमि वाले क्षेत्रों में भू-स्वामित्व का संकेंद्रण बना असमानता का मुख्य कारण।
भारत एक कृषि प्रधान देश है जहाँ करोड़ों लोगों की आजीविका का मुख्य आधार खेती है। हालांकि, 'वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब' (World Inequality Lab) द्वारा जारी अध्ययन "लैंड इनइक्वालिटी इन इंडिया: नेचर, हिस्ट्री एंड मार्केट्स" दर्शाता है कि देश के ग्रामीण इलाकों में भूमि का स्वामित्व बेहद असमान और कुछ ही हाथों में केंद्रित है। नितिन कुमार भारती, डेविड ब्लेकस्ली और समरीन मलिक द्वारा तैयार यह अध्ययन 2.7 लाख गांवों और लगभग 65 करोड़ लोगों के डेटा का विश्लेषण करता है।
ग्रामीण भारत में भूमि स्वामित्व की स्थिति
रिपोर्ट के आंकड़े भारत के गांवों में भूमि के अत्यधिक असमान वितरण को उजागर करते हैं:
भूमिहीनता: देश के लगभग 46% ग्रामीण परिवार पूर्णतः भूमिहीन हैं और आजीविका के लिए मजदूरी या दूसरों की जमीन पर निर्भर हैं।
शीर्ष 10% का कब्जा: कुल भूमि के 44% हिस्से पर देश के शीर्ष 10% भू-स्वामियों का नियंत्रण है।
अत्यधिक संकेंद्रण: शीर्ष 5% आबादी 32% जमीन की मालिक है, जबकि महज 1% सबसे अमीर लोगों के पास देश की 18% जमीन केंद्रित है।
| आबादी का वर्ग | भूमि स्वामित्व की हिस्सेदारी |
|---|---|
| भूमिहीन परिवार | 46% (0% स्वामित्व) |
| शीर्ष 10% भू-स्वामी | 44% |
| शीर्ष 5% भू-स्वामी | 32% |
| शीर्ष 1% भू-स्वामी | 18% |
भू-असमानता के प्रमुख कारण और कारक
उपजाऊ भूमि और असमानता: रिपोर्ट की एक बड़ी विडंबना यह है कि जिन क्षेत्रों में मिट्टी अधिक उपजाऊ है और मौसम अनुकूल है, वहां भूमि का संकेंद्रण कुछ बड़े जमींदारों के हाथों में अधिक देखा गया है।
ऐतिहासिक और औपनिवेशिक प्रभाव: ब्रिटिश शासन के दौरान जहां सीधे तौर पर जमींदारी प्रथा लागू थी, उन इलाकों में आज भी भूमि का बंटवारा अत्यधिक असमान बना हुआ है। (अपवाद: केरल और पश्चिम बंगाल, जहाँ भूमि सुधार नीतियों ने इस खाई को कुछ हद तक कम किया है)।
सामाजिक पहचान: जिन गांवों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की आबादी अधिक है, वहां भूमिहीनता की दर भी औसतन ज्यादा पाई गई है।
बाजार और बुनियादी ढांचे की सीमाएं: शहरों, सड़कों और बाजारों से निकटता भी इस ऐतिहासिक खाई को पाटने में असमर्थ रही है।
विकास और सामाजिक ताने-बाने पर प्रभाव
अध्ययन के अनुसार, औसतन एक बड़ा भू-स्वामी गांव की लगभग 12% जमीन को नियंत्रित करता है, जबकि कुछ मामलों में यह आंकड़ा 50% से अधिक है।
जिन गांवों में भूमि का संकेंद्रण अत्यधिक है, वहां सत्ता और संसाधन एक ही हाथ में सिमट जाने के कारण समग्र विकास (जैसे स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएं व सड़कें) बाधित होता है। यह असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों के अवसर को भी प्रभावित करती है।